कथावाचक
अरुण कमल
हो कोई जो भरे हुँकारी
फिर तो कथा सुनाता जाऊँ
रात-रात भर
कभी न सोऊँ
चाह नहीं कुछ
गाँव नगर में घूम-घूम कर
कथा सुनाता जाऊँ
कहीं पेड़ के नीचे या ओटे पर
विद्यालय में
जहाँ कभी भी जुट जाएँ दस लोग
वहीं पर चित्रकूट हो—
कहना सब को सब को लाना
बच्चे बूढ़े नारि सभी को
बीच-बीच में अर्थ
भी थोड़ा कर दूँगा मैं
हाँ-हाँ बेटे... शंख बजेगा, आना
हारमोनियम लिए घूमता देश-देश मैं
कहीं अभी तक जम न सका हूँ
नहीं रही पहले जैसी उत्सुकता मन में
भक्तों के भी
स्रोत :
रचनाकार : अरुण कमल प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित