लघुकथा :शाश्वत प्रेम
किसी पथिक ने पूछा शाश्वत प्रेम क्या है?
मैनें कुछ सोचकर शान्त चित्त से, मधुर वाणी और अंतर्मन से उत्तर दिया..., 'ईश्वर हो या मनुष्य' जिसके प्रति एक निष्ठ प्रेम जो आपकी सांसें में बस गया हो, जिसके स्मरण से मन प्रफुल्लित रहे, जिसकी छवि सदैव विद्यमान रहे, वही शाश्वत प्रेम है। ये सुनते ही पथिक के अश्रु बहने लगे क्योंकि कोई उसे आज भी अपने प्राण कहता है।
-हेतराम भार्गव हिन्दी जुड़वाँ