By courtsey:-rekhta 🙏
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ
...........अकबर इलाहाबादी
साँस लेती है वो ज़मीन 'फ़िराक़'
जिस पे वो नाज़ से गुज़रते हैं
.............फ़िराक़ गोरखपुरी
किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को
ख़त्म कर देता है हर उम्मीद हर इम्कान को
..............जीशान साहिल
दाएम आबाद रहेगी दुनिया
हम न होंगे कोई हम सा होगा
............... नासिर कीजमी
अब तो इंसान की अज़्मत भी कोई चीज़ नहीं
लोग पत्थर को ख़ुदा मान लिया करते थे
.......शाहबाज़ अहमद