जन्म से स्त्री को बांध देते हैं, खुद की इच्छाओं से, विवाह से पूर्व पिता की इच्छाओं का बोझ, विवाह उपरांत पति की इच्छाओं का बोझ, मां बनने के बाद बच्चो की इच्छाओं का बोझ, उसका तो कुछ रहा ही नहीं, ना इच्छा, ना प्रेम, वो तो दूसरो का करती आईं, और संसार सोचता है स्त्री स्वतंत्र है।।।