मजरूह सुलतानपुरी ने साहिर लुधियानवी की किसी बात पर बर्हम होते हुए कहा, “याद रखो साहिर! जब तुम मर जाओगे तो उर्दू का कोई तरक़्क़ी-पसंद अदीब तुम्हारे जनाज़े के साथ नहीं जाएगा।”
साहिर ने फ़िल-फ़ौर जवाब दिया, “मुझे इसका कोई ग़म नहीं। लेकिन मैं फिर भी हर तरक़्क़ी-पसंद अदीब के जनाज़े में शरीक हूँगा।”
साहिर लुधियानवी ने जां निसार अख़्तर से कहा, “यार जां निसार! अब तुमको पद्मश्री ख़िताब मिल जाना चाहिए।”
जां निसार ने पूछा, “क्यों?”
साहिर ने जवाब दिया, “अब हमसे अकेले ये ज़िल्लत बर्दाश्त नहीं होती।”
साहिर लुधियानवी ने जां निसार अख़्तर से कहा, “यार जां निसार! अब तुमको पद्मश्री ख़िताब मिल जाना चाहिए।”
जां निसार ने पूछा, “क्यों?”
साहिर ने जवाब दिया, “अब हमसे अकेले ये ज़िल्लत बर्दाश्त नहीं होती।”