" अब सवारूं कैसे "
आंखें हैं अश्कों के समंदर में डूबी हुई,
फिर मैं मुस्कुराने की कोशिश कैसे करूं...?
दिल में उमड़ रहा दर्द-ए-ग़म का सैलाब,
फिर चेहरे से खुशी का आगाज कैसे करूं...?
दिल ने पाए हैं जख्म इतने की,
हंसी के पीछे अपने दिल की कसक कैसे छुपाऊं...?
तड़पता हूं रातों के अंधेरों में तन्हा गमों के सायों में,
फिर मैं जुबान से दिल क्या है कैसे छुपाऊं....?
ख्वाब कभी देखे थे हसीन मगर परछाई भी नसीब न हुई,
ख्वाहिश तो थी महफिलों की थी तन्हाई नसीब क्यों हुई..?
हालत कुछ ऐसे पाएं मैंने की करूं तो क्या करूं मैं...?
खुदा तकदीर कुछ यूं लिखी "मित्र" कि सवारूं कैसे मैं..?
{✍️मनिष कुमार "मित्र" 25,11,20🙏🙏}