"दूसरों के दोष देखने से कर्म बँधन होता है और खुद के दोष देखने से कर्मों से मुक्ति मिलती है।" यह कर्म का सिद्धांत है।
अपने खुद के स्वरूप की अज्ञानता ही सबसे बड़ी भूल है। "मैं कौन हूँ?" यह अज्ञान ही सभी दोषों का मूल कारण है?
ज्ञानीपुरुष के आर्शीवाद से यह दोष भस्मीभूत हो जाता है और परिणाम स्वरूप बाकी के सभी दोष भी खत्म होने लगते हैं।
जब तक व्यक्ति को आत्माज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक वह सभी में दोष देखता है और खुद के दोष कभी नहीं देख सकता।
आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद में आपको अपने मन-वचन-काया के प्रति पक्षपात नहीं रहता और ऐसी निष्पक्षपाती दृष्टि के परिणाम स्वरूप आप खुद के दोष देख सकते हैं।