ज़िंदगी के बाद
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हर सफ़र के बाद एक सफ़र पर जाना है,
न फिर लौटे कि ऐसे रहगुज़र पर जाना है
पुकारे भी कोई कितना,न सदाएँ सुनाई दें
उस मंज़िल की ही उस ठहर पर जाना है
हर ख़बर से बेख़बर हर नज़र से ओझल
एक दूर किसी मकाँ में बसर पर जाना है
लाख जतन लाख मिन्नतें भी न रोक सके
दे वक़्त आवाज़ तो उस डगर पर जाना है
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-सन्तोष दौनेरिया
(रहगुज़र - पर, सदाएँ - आवाज़ें, ठहर - स्थान, बेख़बर - अनजान, ओझल - ग़ायब हुआ, बसर - जीवन निर्वाह, जतन - कोशिश, मिन्नतें - विनती का बहु)
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