शीर्षक हैं।"दुविधा" जो कही भी कभी भी मिल जाती हैं।
हर राह पे मिलती दुविधा,
कभी मिलती प्रेम की राह में,
कभी मिलती सत्य की राह में,
कभी मिलती अपनों के लिए,
कभी मिलती दूसरों के,
कभी मिलती दोस्ती में,
कभी मिलती रिश्तों में,
कभी मिलती संस्कारों में,
कभी मिलती मर्याद की सीमाओं में,
तो कभी मिलती जिंदगी में,
पर मिलती हर राह में दुविधा।
कभी यह डालें धर्म संकट में,
तो कभी पार लगा दे,
डूबती नइया को।
जब बैठी लिखने कविता दुविधा पे,
तभी मिली दुविधा ही दुविधा।
इस दुविधा ने डाला,
इतना दुविधा में,
पड़ गई फिर मैं,
दिल और दिमाग की दुविधा में।
आखिर क्यों होती है। यह दुविधा।
(ज्योति कुमारी)