एक पथ्थर से बह रहा है आंसू का पानी,
बस यही है एक कठोर पिता कि निशानी।।
लगी हल्दी, पहनी चूड़ी लगे फेरे मंडप में चार,
खो दिया पिताने दिन की थकान का उपचार।।
बाहर बाहर पथ्थर सा, भीतर भीतर पानी पानी...
कलेजा विदा हो रहा, सिनेमे आह दबाई पिताने,
पूरा जनक नगर निस्तब्ध हो गया विदा ली सिताने।।
धन्य है वो हर जनक, बना धरती पर अमरदानी...
कुंकुम के निशान छोड़े, चल पड़ी दुल्हन की डोली,
आया कोई अजनबी लुटेरा, लूट गया पिता की जोली।।
हस्ते हस्ते विदा किया वो पिता भी कितना अभिमानी...
माना बेटी है पराया धन, पर वो पिता का दिल तो है,
गरीबी में भी नही ज़ुकी, बाबूजी की पघ का सील तो है।।
मनोज वो ही बेटी एक जोके में कैसे हो गई बेगानी...
मनोज संतोकि मानस