महोब्बत की एक कविता मेने गुंगाई थी,
मेने अपने हाथ अपनी अर्थी उठाई थी।।
महेफिल खुशनूमा थीं, मेरे आने से पहले,
कविता पढ़कर मेने उसको रुलाई थी।।
कलम के अलावा कोई सहारा नथी था मेरा,
यह कलम भी मेने मजबूरी में उठाई थी।।
अच्छा है 'जी हुजूर" मेने कभी नही लिखा,
कड़वा था, सच बोलकर राह दिखलाई थी।।
भ्रम था उसका, हम तड़पके मर जायेंगे,
महेफिल मेने सजाई, उसको बोलाई थीं।।
तवज्जो मिली है हर बार मुझे दुनिया की,
जब मैने नकाबपोशी दुनियादारी जलाई थी।।
उम्मीद है कि अब शांति से सोने देगे मनोज,
मेने जीवंत होते ही कब्र अपनी खुदवाई थी।।
मनोज संतोकि मानस