खाने के लिए जब टुकड़ा रोटी नहीं मिलती,
जब बड़े लोग ठोकर मार कर दूर से चले जाते है।
बेईमानी भी पैसों के नशें में शर्मशार नज़र आती हौ,
इंसानियत का दौर जब जब पैसों में मदहोश हो जाते है।
भूखा ही रहा इंसान आइने में देख नज़रे जुका लेते,
तब वहीं क्रोध, क्लेश, उसकी आशा आसमा पे ले जाते है।
नीचे गिरा कीचड़ कभी धरती के आंचल ना समझते,
सब कुछ पाकर एक दिन वो खुद के इंसान होने का वजूद छीन लेते है।
यही दस्तूर चलता रहा है हर एक शक्श हर एक वक़्त पर,
फिर ये क्यू अपनी मदहोश बातो पर खुद को समझाते है?
DEAR ZINDAGI 💞