तुम गलियों को बाज़ार कहता है
मेरे गांव को गवार कहता है
जूते तू सर पर लगाए, उसे तू व्यापार कहता है.....
तू मेरे गांव को बेकार कहता है
दो गज की जमीनों में रहना ,तू उससे संसार कहता है......
पल पल तोले पानी, बिजली सासो तक व्यापार करता है
तू मेरे गांव को बेकार कहता है
तेरी बुराई तो हर अकबार करता है
तू चुल्लू भर पानी को वॉटर पार्क कहता है
बड़े बड़े दलिले हाल कर देती है पंचायत
और तू आंधी दलीलों को दरबार कहता है
तू मेरे गांव को गवार कहता है ....