ये बरसते हुए बादल ये टपकती हुई घर की छत
किसान के चहरे पर मायूसी का भाव नही झलका पाती
क्योकी ये जो बूंदे छत से गिरती है वो खेतो मे अनाज के दाने बनकर हरी भरी फसल मे खिलखिलाती है
उस किसान की रिसती हुई छत ही तो हमारे पेट भरती फिर न जाने हम शहर वाले अपने कम्फर्ट के लिए भिगने से डरते और दुआ करते है ये रुक जाये
मगर याद रखना अगर ये रुकी तो तुम तो पेट भर लोगे मगर कही किसी धर मे , किसी पेड पर अन्नदाता कि साँसे रुकी होगी...
ये कर्ज भी अजीब है जी अमीर को चढ जाये तो वतन छोड देता है और किसी गरीब को चढ जाये तो वो-तन छोड देता है पर क्या फर्क पड़ता है हम फोकट तो थोड़े खाते है पैसा देते है , ये सोच बहोतो मे होती पर मैं इसे इंसानी प्रवृति नही मानता ! इंसान अपनी सोच से इंसान बनता है अगर हर चीज पैसो से खरीदी नही जाती और न ही हर चीज कि किमत पैसो से चुकाते है किसान कि मेहनत उसके प्रति आदर , सम्मान और प्यार के बिना अपूर्ण है
~ पुष्पेन्द्र सिंह सुरेरा