माना हम गुलज़ार और ग़ालिब नहीं है
पर
उनके जैसी चोंट शायद हमने भी खाई है...
माना की वोह आँखो के नूर पर गज़ल लिख लेते थे
और
हम अपनी ख़ुद की पलकों को पोंछ कर ख़ुद की गज़ल लिखते है
माना की वोह इधर-उधर से गुज़रते और अल्फाज़ लिख लेते थे
हम तो ख़ुद के अंदर जांचकर हमारे भीतरी हिस्से को लिखते हे
माना वोह सायर गज़ब है
पर
जनाब हम भी तो अजब है...