(इस साल बारिश न होने से दक्षिण गुजरात की कई नदियाँ सूखी रही)
सूखी नदी
इस साल नदी
जैसे अभी विधवा हुई स्त्री।
अपना सबकुछ खो चुकी।
गहरे शोक में अचेत पड़ी।
मुरझाये मुख पर पानी के छीटे मार मेघ मित्र-सा
चेतना पुनः ला रहा -"हाश अभी नसे धबक रही है।"
सारे आभूषण जैसे अभी तोड़ दिए गए हो।
माँग का सिंदूर जैसे अभी मिटाया गया हो।
अपनी आँखों से गिरे अश्रु से मलिन मुख।
टूट पड़ा जैसे असमय आकस्मिक दुःख।
भर जवानी में जैसे बूढी हो गई।
पर्वत अपनी पुत्री के दुःख से शोकाकुल।
पेड़ परिवार से सांत्वना देते पास खड़े थे।
नदी माँ प्रकृति के गोदी में पड़ी सिसक रही थी।
प्रकृति प्यार से मूक होकर संभाल रही थी।
-दीपेश कामडी 'अनीस'