मैं थी सवार !
तरणी पर ,
भावों का भार,
लिए मन पर |
पीड़ायें मन को
सहलाती ,
सजल नेत्र,
उपहार लिए |
भेद रहे, कुछ ,
भेद रहे,
छुपकर बैठे,
कुछ खेद रहे|
स्पर्श तरिण का,
ऊपर था,
नीचे जलधि,
विस्तार लिए|
चिन्तन करती,
चिन्ता हरती
रक्त लालिमा,
किरणों की
रह-रह कर,
पवन भी वेग करे,
तरणी की गति को,
तेज करे|