कितनी मशरुफी बाते यहाँ
खुद से मिले सदिया हो चली
और आप कहते हो आप बेबस हो
अब आपकी बातो का बुरा क्या मानना..
दुश्मनी है अंदर बाहर साफ हो
आपके मुखौटो से तो मे वाकिफ हु
सायद समझे हमें आप भी कभी
हमारी मजबूरी ओ को बारीकी से..
आप से सुनी है, पीठ पीछे मेरी तारीफे
हद होती है खुदको अच्छा दिखाने की
मुजे पता है जितना आपका चस्मा साफ है
उतनी आपकी नज़र तो नहीं
एक बात जानलो अकेला हु इन वादियों मे
जिंदगी बितानी नहीं मुझको, एक दिन बिताने आया हु
तुम भी आओ तो अच्छा है मेरे लिए
वर्ना आप नहीं भी आए तो क्या बुरा होगा !