मैं उड़ना चाहती हूँ
अपने रंग इस दुनिया मे बिखेरना चाहती हूँ
हर रोज़ एक नई उमंग के साथ उठती हूँ
हर रात एक सुकून की सांस लेती हूँ
छोटे से तकिये के नीचे,
एक बड़ा सा सपना लेके सोती हूँ
निंद्रा अवस्था मे भी न जाने कहाँ खोई सी रहती हूँ
पता नही जिंदगी की जीत का मुझे,
पर,आज मैं खुद से ही जितना चाहती हूँ
मैं उड़ना चाहती हूँ
कई बैर रखने वाले है मुझसे
उन सबकी मैं प्रेरणा बनना चाहती हूँ
दिवाकर कहते है जिनको मेरे अभिभावक
परन्तु उनके जिंदगी का भास्कर,
तो बनना "मैं" चाहती हूँ
जीवन के इस खेल में कही रुक सी जाती हूँ
पर धीरे से कानो में एक ध्वनि गूँज उठती है कि,
अभी तो आँख खुली है तेरी,
अभी तो होश आया है तुझे,
अभी से ही हार मानना चाहती है
सुनते ही फिर चलना आरम्भ करती हूँ
कठिन परिश्रमों के बीच,
जीत का एक मुहर लगाना चाहती हूँ
मैं अपनी उड़ान इस जग को दिखाना चाहती हूँ
मैं उड़ना चाहती हूँ