कहा उसने कि लिखो कभी
इश्क पर भी तुम,
कलम उठी कोरे कागज़ की ओर,
जैसे अभी आन मिले हो तुम
लग गया है सोचने मन,
खो गया है जैसे दिल,
पर क्या जानते हो तुम ?
अनकहा सा अहसास लिए
निंद्रा में भी ढेरों ख्वाब लिए,
केवल चाहती तुम्हारा साथ प्रिये
तकदीर के पन्नों की रचना में
खोजती हूँ हमारे मिलन के दिये।
प्रेम के अनजाने चहरे से,
वाकिफ करा ही दिये हो तुम
अब चेहरा दिखा ही दिए हो,
तो हम अब तसव्वुर में खोए रहते है,
और इसी तसव्वुर के जहां से,
रखती हूँ तुम्हे हमेशा महरूम।
क्या पता जीवन के सोहबत का ?
हाफिज़ों में छुपाकर रखा है तुम्हे,
बस कहीं हो ना जाना गुम।
जैसा मन में उतारा है, वैसे ही रहना तुम
आँखों की कशिश तुम्हारे कुछ कह जाते है
और न जाने क्या - क्या कह जाते,
तुम्हारे ये तबस्सुम।
लबों कि है रुकावट जहाँ,
स्याही में बहते मेरे जस्बात वहाँ, और
जहाँ शब्द मेरे मौन रहे हैं,
कागज पर पड़कर ये बोल रहे हैं
बस.... आँखों से ही सुन लो तुम।
बस.... आँखों से ही सुन लो तुम।