डरता तो मैं था ही नहीं कभी बोली से,
डरता था, तो सिर्फ़ खामोशी से,
कि ये खामोशी के खेत में खिलने वाले खयाल,
पता नहीं कब रोप दिये जायेंगे, कब सींच दिये जायेंगे,
वो उस छोर पर कटी फसल सिर पर लिए जा रहे होंगे,
और यह सब देखते हुए, हम इस छोर पर ही रह जायेंगे ।