इस पनघट पर
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साँझ भरे झुटपुट सी बेला
भरा रहा है हर दिन मेला
चौखट पर मैं खड़ी सोचती
क्या जीवन का यही झमेला ?
हर एक दिन से प्यार किया है
श्वाँसों का व्यापार किया है
अंतर्मन में रहे गूँजता
शब्दों का सन्यासी मेला ---
आस बहुत रखी है मन ने
श्वाँस अभी चलती है तन में
रूई सी धुनता रहता है
जाने मन क्यों यहाँ अकेला ?
इस पनघट से उस पनघट पर
जाते-जाते साँझ हो गई
बहुत थके हैं अब पग मेरे
कठिन बना जीवन का खेला ---
मन को अब बहलाऊँ कैसे ?
श्वाँसों में गति लाऊँ कैसे ?
पगडंडी से उतर गई हूँ
बही जा रही जैसे रेला ---||
डॉ. प्रणव भारती