बरसात
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बात बरसात की एक रात की,
स्याह काली घटा घनघोर सी,
मैं अल्हड़ मदमस्त हुई
पिया के रंग में मदहोश सी,
चली राह पे झूमती पिया के संग,
छुआ जो पिया ने तो सिहर गया मन ,
साँस अटकी ओ जुल्फ भी उलझी मेरी,
तेज होकर बिखर गई धड़कन मेरी,
सिहर गई लगा कांपने तन बदन,
प्रेम भी रंगने लगा था मेरा मन,
टूट गए सारे बंधन मेरे
छूटी लोक लाज की भी जकड़न,
लगा आकाश संग में रंग बरसाने,
और प्यास बुझी धरती की जनम जनम।
विनय ... दिल से बस यूँ ही