अनुबंध कर लें
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जानती हूँ स्वप्न सारे ,घिर रहे अँधियार में हैं
और स्वप्निल गीत सारे, डूबते मझधार में हैं
खाली झोली ताकती है ,और समय को बाँचती है
ठूँठ है समय का आँचल ,सुन रहे न कोई ,कलकल
साँस सिरहाने खड़ी है ,ह्रदय में गाँठें पड़ी हैं
किस प्रतीक्षा को छलेंगे ?मौन ही बस हम रहेंगे !
आओ,मिल कर साथ चल लें ,आज से अनुबंध कर लें | |