तुमको अपनी बातों के लिए,
मेरी तरह शब्दों का,
आश्रय नहीं लेना पड़ता,
इसीलिए तुम कह जाते हो,
मन की न जाने कितनी बातें,
और किसी को भान भी नहीं होता
कि तुम इतने #वाचाल हो।।
मोरपंख से सजे, कुंतल,
जमुना की गहराई वाले नयन,
भुवनमोहिनी मुस्कान,
बाँसुरी की तान।।
लहराता पीताम्बर,
त्रिभंगी मुद्रा, और
चञ्चलता के शिखर पर भी,
संतृप्ति भरी शांति....
सब करते हैं, कुछ
विशिष्ट बातें, स्नेह की,
अपनेपन की, साथ की,
साहचर्य की, प्रेम की।
मैं उत्तर दूँ, शब्दों का आश्रय ले,
तो वृंदावन मुझे #वाचाल कहेगा।।
#वाचाल = #बातूनी