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रावल रतन सिंह और महारानी पद्मिनी यह अध्याय खिलजी के आक्रमण को प्रेम कहानी के बजाय सभ्यता के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें रानी पद्मिनी के अस्तित्व की पुष्टि और मेवाड़ के गौरवशाली प्रतिरोध का वर्णन है। इसके साथ ही, यह अध्याय गोरा-बादल के बलिदान, रानी की कूटनीतिक सूझबूझ, और 16,000 महिलाओं के जौहर को प्रमुखता से दर्शाता है, जो सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया। पढ़े - https://www.matrubharti.com/book/19993810/part-01-maharana-thousand-years-of-crusade-4
3.. रावल जैत्रसिंह (शासनकाल: 1213–1253 ईस्वी)। इल्तुतमिश के अहंकार का मर्दन और भूताला का युद्ध यह वह दौर था जब दिल्ली सल्तनत का सुल्तान इल्तुतमिश अपनी अजेय सेना के घमंड में चूर था। वह संपूर्ण भारत पर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता था। इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़े थे मेवाड़ के शासक रावल जैत्रसिंह। जब इल्तुतमिश ने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी नागदा पर हमला कर उसे तहस-नहस किया, तब रावल जैत्रसिंह ने पीछे हटने के बजाय धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाई। गोगुंदा के पास ऐतिहासिक 'भूताला के युद्ध' में रावल जैत्रसिंह ने अपनी कुशल युद्धनीति और अदम्य साहस का परिचय देते हुए इल्तुतमिश की विशाल तुर्क सेना को इस कदर काटा कि दिल्ली के सुल्तान को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। इस युद्ध में मेवाड़ के वीरों ने न केवल तुर्कों के अहंकार को कुचला, बल्कि सदियों तक के लिए दिल्ली सल्तनत को हिलाकर रख दिया। तुर्कों द्वारा नागदा को नष्ट किए जाने के बाद, रावल जैत्रसिंह ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। उन्होंने सामरिक दृष्टि से बेहद सुरक्षित और अभेद्य चित्तौड़गढ़ दुर्ग को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया। उनके इस एक फैसले ने आने वाली सदियों के लिए मेवाड़ को प्रतिरोध का सबसे बड़ा केंद्र बना दिया। उन्हीं की तैयार की हुई इस मजबूत नींव पर आगे चलकर रावल रतन सिंह, महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ धर्मयुद्ध जारी रखा। पढ़े - https://www.matrubharti.com/book/19993612/part-01-maharana-thousand-years-of-crusade-3
2.. रावल खुमान : अरबों का काल रावल खुमाण द्वितीय 9वीं सदी में मेवाड़ के गहलोत वंश के शासक थे जो अरब आक्रमणों के खिलाफ हिंदू धर्म की सबसे बड़ी ढाल बने। उन्होंने भीनमाल के राजा नागभट्ट के साथ मिलकर सेनापति हाशिम की सेना को हराकर अरबों को दशकों तक भारत से दूर रखा। उनकी सबसे बड़ी जीत अरब सेनापति अल मामू उर्फ महमूद के खिलाफ थी, जिसे उन्होंने युद्ध में हराकर बंदी बना लिया और भविष्य में आक्रमण न करने का प्रण लेकर ही छोड़ा। खुमाण ने कश्मीर से रामेश्वरम तक 40 हिंदू राजवंशों को एकजुट करके एक विशाल सेना खड़ी की और अरबों को निर्णायक रूप से पराजित किया। उनके कारण भारत लगभग 500 वर्षों तक अरब आक्रमणों से सुरक्षित रहा। इतिहासकार मानते हैं कि अगर खुमाण हार जाते तो इस्लाम का प्रसार चीन और सुदूर पूर्व तक हो सकता था। इतने बड़े योगदान के बावजूद खुमाण का नाम इतिहास से लगभग मिटा दिया गया। फिर भी मेवाड़ में आज भी लोग कहते हैं “थनै खुमाण राखै” यानी खुमाण तुम्हारी रक्षा करें। खुमाण का जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब हिंदू राजा संगठित होते हैं तो कोई भी आक्रमण उन्हें रोक नहीं सकता। पढ़े — https://www.matrubharti.com/book/19993485/part-01-maharana-thousand-years-of-crusade-2
1.. बाप्पा रावल : मेवाड़ के संस्थापक राजा बाप्पा रावल ने 8वीं सदी में अरब आक्रमणों को हराकर हिंदू धर्म और सभ्यता की रक्षा की। उनकी विजय के कारण 500 साल तक अरब भारत में नहीं घुस पाए ।पाकिस्तान-अफगानिस्तान में आज भी हिंदुओं का बचे रहना और इस्लामाबाद-रावलपिंडी जैसे नाम उनके प्रभाव का प्रमाण हैं। नागभट्ट, ललितादित्य जैसे अन्य महान राजाओं ने भी अरबों को रोका, लेकिन बाप्पा का योगदान सबसे निर्णायक रहा। अरब इतिहासकार भी लिखते हैं कि भारत के लोग मूर्तिपूजा की ओर लौट आए और मुसलमानों को शरण नहीं मिली। चालीस साल राज करने के बाद बाप्पा ने राज्य त्यागकर शिव आराधना में जीवन बिताया और मोक्ष प्राप्त किया। दुर्भाग्य से ऐसे महान योद्धा को इतिहास से मिटा दिया गया, जबकि उनका संघर्ष ही हिंदुत्व के अस्तित्व की नींव बना। जरूर पढ़े 👇 https://www.matrubharti.com/book/19993187/part-01-maharana-thousand-years-of-crusade-1-bappa-rawal-founding-king-of-mewar
यह पुस्तक “महाराणा: सहस्र वर्षों का धर्मयुद्ध” मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश द्वारा सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए लड़े गए 1000 वर्ष के निरंतर संघर्ष का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप तक के योद्धाओं के अटूट साहस को रेखांकित करते हुए प्रचलित इतिहास लेखन में उपेक्षित नायकों के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती है। यह पुस्तक इतिहास के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, जो हर पाठक के लिए आवश्यक है। https://www.matrubharti.com/book/19993093/01
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