न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं
युग पुराना था या अब नया आ गया ,
न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।
एक अहिल्या थी , जिसने पति को कभी
अपने हृदय के तल से हटाया न था ।
छद्म-छल से कोई पर-पुरुष दर पर आया ,
अहिल्या ने उसको बुलाया न था ।
फिर भी पत्नी को प्रतारणा क्यों मिली ?
कि वह नारी स्वयं को जिला ना सकी !
उस ऋषि से पति आज भी जग में हैं ,
जिनको पत्नी की पीड़ा रुलाती नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।
क्यों अहिल्या ने प्रतीक्षा की राम की ?
राम ने भी तो पत्नी को बक्शा नहीं !
गलती रावण ने की , दंड सीता को क्यों ?
गर्भधारण करा सीता वन भेज दी !
दो-दो बेटों को जन्मा और पोषण किया,
जब अकेली थी , तब ममता शक्ति बनी ।
अंत में धरती की गोद में सो गई ,
पर पति से किया था गिला भी नहीं।
ऐसे दम्भी पिता आज भी जग में हैं ,
जिनको तुतलाती वाणी लुभाती नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।
पाँच पांडवों की पत्नी लुटी द्रौपदी ,
लूटने वाले नर-भेड़िए कौन थे ?
पत्नी को द्यूत के दाँव पर जब रखा ,
दर्शकों में पितामह , गुरु द्रोण थे ।
नारी लुटती रही और तड़पती रही ,
तब सभा में सभी वीर क्यों मौन थे ?
आज भी जग में लुटती हैं बेटी-बहन ,
उनकी आहें सिंहासन हिलाती नहीं ।
माँगती हैं वो हर रिश्ते से अपना हक
अपनी इज्जत की करती नीलामी नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।
महाभारत के युद्ध में लाखों मरे ,
युद्ध का हेतु तो सत्ता का लोभ था ।
पांडवों ने भी तोड़ा था वह हर नियम ,
नारी के हित में जो पालने योग्य था ।
ध्वस्त मानवता थी , त्याग का ह्रास था ,
नारी के टूटे हृदय में यह क्षोभ था।
पत्नी की रक्षा में बाधा जो धर्म था ,
सत्ता के युद्ध में वह क्यों पाला नहीं ।
अन्त में कोख उजड़ी , छिना मातृ-सुख ,
हृदय का टुकड़ा जग में रहा ही नहीं ।।
युग पुराना था या अब नया आ गया ,
न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।