Hindi Quote in Poem by Dr kavita Tyagi

Poem quotes are very popular on BitesApp with millions of authors writing small inspirational quotes in Hindi daily and inspiring the readers, you can start writing today and fulfill your life of becoming the quotes writer or poem writer.

न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं

युग पुराना था या अब नया आ गया ,
न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।

एक अहिल्या थी , जिसने पति को कभी
अपने हृदय के तल से हटाया न था ।
छद्म-छल से कोई पर-पुरुष दर पर आया ,
अहिल्या ने उसको बुलाया न था ।
फिर भी पत्नी को प्रतारणा क्यों मिली ?
कि वह नारी स्वयं को जिला ना सकी !
उस ऋषि से पति आज भी जग में हैं ,
जिनको पत्नी की पीड़ा रुलाती नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।

क्यों अहिल्या ने प्रतीक्षा की राम की ?
राम ने भी तो पत्नी को बक्शा नहीं !
गलती रावण ने की , दंड सीता को क्यों ?
गर्भधारण करा सीता वन भेज दी !
दो-दो बेटों को जन्मा और पोषण किया,
जब अकेली थी , तब ममता शक्ति बनी ।
अंत में धरती की गोद में सो गई ,
पर पति से किया था गिला भी नहीं।
ऐसे दम्भी पिता आज भी जग में हैं ,
जिनको तुतलाती वाणी लुभाती नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।

पाँच पांडवों की पत्नी लुटी द्रौपदी ,
लूटने वाले नर-भेड़िए कौन थे ?
पत्नी को द्यूत के दाँव पर जब रखा ,
दर्शकों में पितामह , गुरु द्रोण थे ।
नारी लुटती रही और तड़पती रही ,
तब सभा में सभी वीर क्यों मौन थे ?
आज भी जग में लुटती हैं बेटी-बहन ,
उनकी आहें सिंहासन हिलाती नहीं ।
माँगती हैं वो हर रिश्ते से अपना हक
अपनी इज्जत की करती नीलामी नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।

महाभारत के युद्ध में लाखों मरे ,
युद्ध का हेतु तो सत्ता का लोभ था ।
पांडवों ने भी तोड़ा था वह हर नियम ,
नारी के हित में जो पालने योग्य था ।
ध्वस्त मानवता थी , त्याग का ह्रास था ,
नारी के टूटे हृदय में यह क्षोभ था।
पत्नी की रक्षा में बाधा जो धर्म था ,
सत्ता के युद्ध में वह क्यों पाला नहीं ।
अन्त में कोख उजड़ी , छिना मातृ-सुख ,
हृदय का टुकड़ा जग में रहा ही नहीं ।।

युग पुराना था या अब नया आ गया ,
न्याय नारी को अब तक मिला ही नहीं ।
नारी जीती रही , मरती-मिटती रही ,
उसके मन का कमल पर खिला ही नहीं ।।

Hindi Poem by Dr kavita Tyagi : 111475514
New bites

just for knowledge...

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now