मित्र समझा है तुझे,
मित्र बन कर ही रहना
न करना कोई बात ऐसी
झुक जाए सिर मेरा
शर्मसार हो जाऊँ खुद से
न कर पाऊँ फिर भरोसा
चाहा है तुझे
मित्रता के मापदंडों से
सम्मान के ऊँचे कंगूरे पर
तुझे बैठाया है
वही मान और सम्मान तुझसे
पाने को ख्वाहिश मुझे
कोशिश मेरी पाने की तुझमें
मेरा बाल सखा,मेरा भाई
कह सकूँ जिससे वो बातें सारी
आज तक जो कह न पायी
मन की बातें ,जो रही अधूरी
पर अफसोस जता न पायी
खूब सुनाऊँ तुझे वो ख्वाहिश
जो अधूरी रह गई
कभी सुनाऊँ बचपन की यादें
कभी कोई बात पुरानी
जिसे याद कर
आ जाये आंखों में पानी
कभी चाँद तारों की बातें
कभी कहूँ अपनी परेशानी
कभी सास का झगडा
कभी कहूँ वो बात
जो पति ने न मानी
पकड़ सकूँ हाथों को तेरे
मन में जब हो बैचेनी
सिर रखकर कंधे पर रो लूँ
मन से थोड़ी हल्की हो लूँ
मित्र बनाकर तुझको अपना
तुझसे अपना दुखड़ा रो लूँ
बस इन बातों की ख्वाहिश है
भावना है ये एक अनोखी
जो हर किसी से जुड़ नहीं पाती
किसी को मित्र बना नहीं पाती
किसी को मित्र कह नहीं पाती