में स्त्री हू...
में सबकी नजरमे तुच्छ हू....
में अभी भी अबला हू...
मुझे जिने का कोई हक़ नहीं....
मेरा जीना बोज ही है....
में स्त्री हू....
चार दीवाल मेरी दुनिया है...
चुलचोका ही मेरा कर्तव्य है....
घरकी गुलामी मेरी आदत है....
बच्चे पैदा करने की में मशीन हू....
में स्त्री हू...
आत्मसम्मान शब्द मेरे जीवन में नहीं....
इच्छाए मेरी अब बिक गई बजारमे....
हवस ही सबकी जरुरत है...
तुच्छकार झेलना मेरी दुनिया है....
में स्त्री हू....
मेरी बात समझना सबकी उलझन है....
सम्मान देना हुसूलो के खिलाफ है....
माँ बननेका गौरव लेना अहम है.....
पुत्री बनाना जैसे दया है....
में स्त्री हू.....
कामयाबी छू लू तो स्वछन्दी हू....
पढ़लिख लू तो डोर नहीं होती मेरी....
आवाज उठाऊ तो दब जाती हू...
साथ चलना मेरा हक़ नहीं....
में स्त्री हू.....