आँगन के इस पेड़ की ठंडी मीठी छाँव
शहर में जैसे आ गया चलकर मेरा गाँव।
आया चलकर मेरा गाँव शहर
माहौल यहां का देखकर
गया पल भर ठहर।
छाँव से ही शहर गाँव सा लगे
बाकी इस शहर की धूप में इंसान की नियत तक जले।
सो पेड़ काटे तब जाकर एक पेड़ लगाए
फिर उस एक पेड़ की छाँव को #निर्दयी आपस में बैर लगाए।
पेड़ की छाँव भी यहां लगती है जहर
इंसानियत की ना एक बूंद ना कोई लहर।
देखकर आँगन के इस पेड़ की छाँव
जैसे आया था वैसे ही लौट गया मेरा गाँव।
#निर्दयी