उग्रता से समाधान हो नही सकता,
व्याकुलता से व्यवधान टल नहीं सकता ।।
भारत की माटी में सेंध लगा है
चाटुकारिता ने साहित्य को खा रखा है ।।
प्रेम भारत की माटी से किसको है
सबने अपना अपना विचार का भारत बना रखा है ।।
कोई लाल तो कोई काला
अब क्या बताए किसने किसका रंग चढा रखा है ।।
सबका अपना अपना इतिहास है
सबने अपनो के पुतलों के सामने शीश कटा रखा है ।।
बहरे और गूंगे थे वो भी कभी एक जमाना था
किंतु हाँ अब हम सब मुर्दे है
जहाँ चार मिले नहीं की उनके कंधे पे अपना वजूद बेच रखा है ।।
अब मत कहो हमसे कुछ
किनारे से दरिया देखता हूँ
एक दौर था जो गुजर गया
डूब कर मैं निकल गया ।।
#उग्र