|| गाँव ||
गाँव मैं पहले सा अब कुछ ना रहा
वोह पगडण्डी, गली का आख़री मकान ना रहा ||
कच्ची सडक, खेत खलियान ना रहा,
वोह अल्हड़ बचपन, सोख जवानी ना रहा |||
पीपल का पेड़, कुए का पानी ना रहा,
बूढ़ा बरगद की ठंडी छांब ना रहा,
मटके का जल ना रहा ||||
सर पे बुज़ुर्गों का हात सहलाना ना रहा
साइकिल के टायर के पीछे बच्चों का भागना ना रहा |
वोह दूरदर्शन पर रामायण चित्रहार देखना ना रहा
रेडियो पे बिनाका गीत माला ना रहा
पंचायत मैं छोटी मोटी तकरार ना रहा
रोटियां सेकती संयुक्त परिबार ना रहा
शहर की आवा हवा ओढ़े, अपनी नज़ाकत खोये
मेरा गाँव अब मन भाबन ना रहा. ||||