न रही बसमें जिंदगी
कुछ एसी थी बेहूदगी
एक तरफ थी खाई की रचाई
तो दुसरी ओर कुएँकी खुदाई
एसी बनाई कुछ परिस्थिति
कुछ भी न सोच पाए मति
मनको बडा थी तडपाती
गहराईमें बात जो सडती
किसको अपना दर्द सुनाती
अपनोंसे ही वो धोखा खाती
चलत थी पीछेसे छुरी
यही थी बडी मजबूरी
बना ली दूरी अकेली रहती
न कुछभी बयान कर पाती
क्या है बीती कब है बीती
यही सोचती कयों है बीती
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