शुभस्य शीघ्रम् का पाठ है प्रचलित , फिर मन क्यों समझ न पाता
आज का कल और कल का परसों , अपना काम है टलता जाता
काम जहां था वहीं पर होता , मन अपना ठहर न पाता
वर्षों पहले कहा कबीरा , मन अब भी है वो गाता
कथनी - करनी का अंतर अब भी , अपना मन समझ न पाता
बिना विचारे शीघ्रता जो करता , वो शैतान की पदवी पाता
हम चाहें सफलता काम की यदि , तन - मन अर्पित किया जाता
ईमान कर्म और भाव शुद्ध हो , और संशय मन नहीं रह जाता
कर्म को पूजा मान किया यदि , फल निश्चय ही वो पाता
हर अच्छे काम में देरी करके , आदमी असफलता को है बुलाता
मन से निर्बल होता है वह , आलस को भी है वो छुपाता
दुनिया क्यों बढ़ गई उससे आगे , कभी भी समझ न पाता
यथा युक्ति अपनाकर हम , बढ़ सकते हैं जीवन में
लाभ - हानि सोचकर सोचें , कोई दोष न पनपे मन में
#शीघ्र