आज की प्रतियोगिता "
#सभ्य .विषय "
*** कविता "
हम सभ्य थे ।
असभ्य हो गये ।।
हम मानव थे ।
अब दानव हो गये ।।
हम स्त्रीयों को देवी मानते थे ।
आज हम हैवानियत हो गये ।।
उनकी लज्जा को तार तार करने लगे ।
हम सुसंस्कृत और दयालु थे ।।
आज असभ्य और क्रुर हो गये ।
पहले हम रक्षा करते थे ।।
आज हम आतंकी बन खुन बहाने लगे ।
पहले हम परोपकारी थे ।
आज हम पापाचारी हो गये ।।
पहले हम निःस्वार्थि थे ।
आज हम स्वार्थी हो गये ।।
पहले हम देश भक्त थे ।
आज हम गद्दार हो गये ।।
पहले हम मीठा बोलते थे ।
आज हम झुठ बोलने के आदी हो गये ।।
बृजेश कहता है जमाना नही बदला ।
पर हम दिल से बदल ही गये ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि , अमदाबाद ,गुजरात ।