अगर किस्मत मैं नहीं थे तो उनसे मुलाक़ात क्यों हुई??
एक दूजे के लिए नहीं बने थे तो
बेपनाह मोहब्बत क्यों हुई?
काश वोह यादों के मकान का किरायेदार ना होता
उनके साथ एक एक लम्हा यादगार ना होता
ना कोई शिकवा गिला मुझको
हमने कौनसी वफ़ा निभाई जो बेवफा कहे उनको ||
फिर भी कभी याद जो आती है उनका तन्हाई मैं
दिल मैं दर्द की दस्तक सी दे जाती है
यादों का सैलाब सा उठ ता है रह रह के सीने मैं
सच मैं कितना मुश्किल है उनसे बिछड़ के जीने मैं ||||