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30/05/2020
गुमनाम-ए-जिंदगी
उलझी है ये जिंदगी सुलझाना नहीं आता ।
टूटे है इस कदर हम ...
जो अब खुदको ही "दिलासा-ए-दिल" समझना नहीं आता।
नहीं धोखा दे सकते है किसी "अपने को" ,
जिसने मुस्कुराने की वजह दी ,,
उस की आंखों में "तकलीफ-ए-मोहोबत-ए-आशु" निकालना नहीं आता।
सच एक ऐसा कड़वा गुट बन चुका है,,
ये "गुमनाम-ए-जिंदगी" का !!
खुद को बोले तो "मजबुर-ए-दिल" सहा नहीं जाता !!
और ..
उस को बोले बीना " मुक्मल-ए-जुबान" रहा नहीं जाता ।
Alfaz-E-Suhana ✍️✍️