वो दिन भी बडे खुशनुमा थे जब कभी महोब्बत करता था,
उन दिनो में कवि बन बेठा था जब महोब्बत सुरु कीया था,
उन दिनों में दुनिया को भुल बेठा था जब महोब्बत का इज़हार किया था,
उन दिनों तहजीब को अपना चुका था जब महोब्बत का पहला वाक्यां बोला था,
उन दिनों दुआएं करता रहता था जब महोब्बत के लिए कसमे वादे खा रहा था,
उन दिनों गलिया भी जन्नत सी लग रही थी जब महोब्बत का इज़हार कबूल हुआ था,
उन दिनों मिज़ाज बदला सा लग रहा था जब महोब्बत पुरी शिद्दत से पा लीया था,
उन दिनों खुशीया इतनी अच्छी होगी उसका अहसास पहेली बार हुआ था,
वो दिन भी बडे खुशनुमा थे जब कभी महोब्बत करता था।