मैं अक्सर झुकती हुँ
क्योंकि तुम्हे खोने से डरती हुं
हर बात मानती हुँ
बिन गलती माफी माँगती हुँ
क्योंकि तुम्हे खोने से डरती हुँ
दर्द होता है पर मुस्काती हुँ
आंखों में अश्क छुपाती हूँ
क्योंकि तुम्हे खोने से डरती हुँ
तेरी हर खाता माफ करती हूं
दर्द हो तो चुपके से सहती हुँ
क्योंकि मैं तुम्हे खोने से डरती हूं
कभी बातूनी रहती हूं
कभी खामोश हो जाती हूँ
क्योंकि मैं तुम्हे खोने से डरती हुँ
खुद को भूल जाती हूँ
तुझे याद रखती हूं
क्योंकि मैं तुम्हे खोने से डरती हुँ
तेरी खुशी के लिए कुछ भी
कर जाती हूँ
तू कहे तो पास कहे तो
दूर हो जाती हूँ
क्योंकि मैं तुम्हे खोने से डरती हुँ
अपने जज़्बातों को
समेटती हुँ
अपनी बेचैनी छुपाती हुँ
क्योंकि मैं तुझे खोने से डरती हुँ
कई बार कितनी तन्हा होती हुँ
पर तेरी परछाई बने
साथ चलती हुँ
क्योंकि मैं तुझे खोने से डरती हुँ