क्या दिन की शुरुआत इसलिए होती है की उसे शाम काे किसी एंकात में हमेशा के लिए खत्म किया जा सके? किसी को खत्म करने से आसान क्या दिन को खत्म करना होता है? शाम की पीली दूपहर में एक हवां केवल एकांत में बैठने से गुजरती है, जिसमें वह सभी फैसले लिए जा सकते है, जो अभी तक नहीं लेने के असफल कोशिशों में जीवित है। जैसे छुटे हुए संबधों के बारे में सोचा, वह लिखना जो कभी लिखा नहीं, अतित को फिर वर्तमान में शामिल करना। उस हवां में इन सभी फैसलों को साकार कर सकते है। उस समय आंखों में टीस आते ही हवां उसी तरह ओझल हो जाती है। जैसे छोटे बच्चे शर्माते हुए भीतर कमरें में चले जाते है। पिली धूप शाम के एकांत को जीवित रखती है। पेड़ के नीचे बैठकर वह धूप में खुद के प्रतिबिंब को एकांत समझकर सुबह के जीवन को तलाशने लगाता है। जैसे-जैसे शाम खत्म होने लगी है। जमीन में धूप से बनी उसकी प्रतिबिंब भी बिखरने लगती है। वह दिन के खत्म होने में खुद के प्रतिबिंब को देखता है। पहले उसके दोनों पैर, फिर हाथ और आधा शरीर कम होती धूप में प्रतिबिंब से खत्म हो गई। अब केवल उसका सर बचा हुआ था, जो बचे हुए शेष धूप में दूर दिखाई देने लगा था। वह सोचता है, क्या इसे ही दिन का खत्म होना कहते है। सुुबह का प्रतिबिंब जिसे वह स्वंय कहता था, वह अब अंधेरे में उसके साथ नहीं है। उसका शरीर खत्म होने के बाद बची हुई राख में जीवित है। वह अपने जिए हुए दिन को खत्म कर एक कतार में जमीन को देखते हुए भीतर के जीवन की ओर आगे बढ़ने लगता है। -(एक लंबी कहानी का लिखा हुआ छोटा अंश)