प्रेम आत्मा और परमात्मा के बीच की कड़ी है , मनुष्यो से मनुष्यो के बीच यह सफल नही |भ्रमवश वे आकर्षण को ही प्रेम का पर्याय मान लेते है, किन्तु वह आकर्षण की पराकाष्ठा ही होती है,प्रेम नही | यद्यपि, हर प्राणी मे ईश्वर का वास है यदि यह मानकर हम उससे प्रेम करें तो उसके मूल तक पहुँच सकते है, परन्तु समान्यत: यह बहुत कठिन है|