मैं
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नारी हूँ मैं,एक नदी हूँ मैं,
निश्छल,पावन,सुधा गरल हूँ मैं,
आई पर्वतो को चीर कर,
अपनी राह खुद बनाती हूँ मैं,
प्यासे को जीवन नीर दिया मैंने,
जहाँ बही जीवन मधुर करती हूँ मैं,
बहते रहना ही काम है मेरा,
ना रोक मुझे कि तूफां भी एक नाम हूँ मैं
नारी और नदी एक रूप हूँ मैं,
पावन कर दूं तुझे एक छाँव हूँ मैं,
ना खेल मेरे जज्बातों से,
की विनाश का भी दूसरा नाम हूँ मैं।
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विनय ……। दिल से
,एक नारी होने पर