कह दूँ तुम्हेँ
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गर सुन सको तो आपकी
आँखों से कुछ कह दूँ ,
एक सागर है ये गहरा
जिसमे थोड़ा डूब लूँ ,
गहरे भूरे रंग की
ये आँखे चंचल चपल सी,
क्या ढूंढती रहती हैं हमेशा
जैसे कुछ मिला नहीं,
एक क्षण को साँस लेकर
देखो तो मेरी और,
क्या मेरी आँखों में तुम्हे
कुछ भी दिखता नहीं,
वो आँखे जिनमे समाई है
सारी दुनिया मेरी,
क्यों उसी दुनिया मेँ
मेरी कोई जगह नहीं,
सुन्दर कटीली आँखे तुम्हारी,
गहरे वार हैं इनके,
क्यों मुझे जख्म के सिवा
इनसे कुछ मिला नहीं,
खोई खोई सी रहती हैं
ये आँखे हमेशा ,
क्यों सुकून से
संग मेरे ये रहती नहीं ,
कभी भोली कभी नादाँ
तो कभी अंगारे की मानिंद हैं ये,
एक झील की गहराई लेकर भी
क्यों शांत नहीं है ये,
.
.
विनय …...दिल से बस यूँ ही