क्या हम अपनी हर यात्रा भीतर से करते है या फिर भीतर शब्द यात्रा के अंतिम दिन दिल में हमेशा के लिए रह जाता है? जिसे यादकर फिर एक बार वह यात्रा करने काे सोचते है। लेकिन मेरा तो इस शहर से कोई नाता नही, फिर यहाँ क्यों लौटूंगा? यह एक नए इंसान से मुलाकात की तरह है। यह सवाल खुद से था जिसने कोलकाता को नए सिरे से समझाना चाहा. मुझे हर नया शहर किसी इंसान के शक्ल सा तरह नजर आता है, जिसे एक मुलाकात में भीतर से नही समझा जा सकता। सो मैंने शहर का नाम मुलाकात रख दिया और उससे मिलने सड़कों निकल पड़ा। हर शहर भीतर से अलग होने के बाद भी उसका एक छोर अपना पन सा अहसास दिलाता है, जिसे देखकर लगता है इस जगह से हमारा पुराना नाता है पर यह यहाँ कैसे! मेरी नजर एक कॉफ़ी शॉप पर पड़ी वह हुबहू मुंबई शहर की तरह था, जिसके इर्द-गिर्द ढेरों संवाद हवाओं में थे जो पुरानी मुलाकात की याद दिलाने लगा। उस दिन को फिर एक बार जीने मैंने कॉफ़ी पीना चाहा और नए शहर में मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। मैं उसका नाम जानने फिर सड़कों पर आगे बढ़ा। ऊची इमारते अपने शहर के शक्ल में सामने खड़ा था। सवाल आया हमारा शहर यहाँ कैसे हैं? क्या सभी शहर एक शक्ल के बने होते है? जो हर जगह एक सामान नजर आते है? तभी तेजी से ऑटो गुजरा ऐसा लगा जैसे कोई हाथ पकड़ कर सड़कों से खीच लाया हो और कहा, मैं कब से ढूंढ रही हूं कहां थे तुम? और यहाँ कैसे आए हो ?
मेरे जवाब, तुमसे मुलाकात करने क्या हम बैठकर कुछ समय बात कर सकते है?
उसने कहा, मुझे एकांत आकर्षित करता है हम वहा चलते है।
हाँ क्यों नहीं वहां अच्छी मुलाकात होगी।
हम ढलते हुए सूर्य के पास पहुंचे और सारा दिन एकांत में रहने के बाद मैंने अंत में कहा- तुम बिलकुल उसी तरह हो जब मैंने पहली बार प्यार में एक नए शहर हो महसूस किया था। तुमको देखने से मेरा प्रिय शहर नजर आता है। यह मुलाक़ात अच्छी रही।
जाते वक्त उसने कहा, क्या तुम फिर लौटकर आओगे यहाँ?
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, जरूर आऊंगा पर हमारी मुलाक़ात तो रोज होगी क्योंकी मेरे शहर में भी तुम्हारी तरह देखने वाला एकांत है, हम वही मिल लिया करंगे।
वैसे मेरा नाम मुलाकात नही कोलकाता है, मुझे पता है बस तुमसे सुनना था.. ♥️