बहुत कुछ ऐसा था जो संजों के रखा था जो याद भी था और बहुत कुछ ऐसा भी था जो रख कर भूल गया था...
लेकिन ये ज़िन्दगी भी ना!!!
कुछ भी छुपा कर नहीं रखने देती है...
हर बात को वक़्त आने पर खोल कर रख देती है...
ना जाने ऐसे कितने पल थे जो रखे थे कि वक़्त आने पर खोल कर देखूँगा लेकिन उनकी गिरहें वक़्त के साथ-साथ इतनी गहरी हो गयीं कि उनका खुलना नामुमकिन हो गया...छोड़ दिया उन पलों को उन्ही ना खुलने वाली गांठों के साथ...
कुछ ऐसे पल थे कि जो रख तो दिये थे मगर याद नहीं रहे...उनकी तहें खोल के देखा तो खुद को उन पलों के साथ जुड़ा पाया...
खुद से मिलने का मौका मिला...
खुद से बात करने का मौका मिला...
खुद को जानने का मौका मिला...
अरसा हो गया था...खुद से मिले हुए!!!
अरसा हो गया था...खुद को देखे हुए!!!
उफ़्फ़!!!
ये जिंदगी भी ना...
~ज़िन्दगी की किताब से~