फागुन भागि रहा है आगे ,चाँद चिढ़ाय -चिढ़ाय कै भागे ।
राति -राति भर नींद न आवै, उनकी छवि भुलाय नहि जावै
हँसय मित्र औ उन्हैं चिढ़ावै ,पीर न हिरदय की सहि जावै ।
सपने माँ मन शत -शत बारा ,देवि पत्नि कय आरति बारा ।क्षमा हृदय से करहु भवानी ,समुझौ हम हैं पति अज्ञानी ।
कलपि रहा है हृदय हमारा ,अँखियाँ बनी जाय फव्वारा ।
साँपि लोटि सीने पर जावै ,जब कलुवा मलकिन संग जावै
आइत है तुम्हरे घर आजू ,नहि भय रूठै राज समाजू ।
गए विनोदी लाल जी सोच यही ससुराल ।
शंका न मन मँह तनिक भी होई हुँवा बवाल ।।
#विनोदी