Hindi Quote in Blog by Ashok पराशर

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#Justiceन्याय ,एक आदर्श शब्द है,जो किसी कार्य,उसकेकारण,व्यापकता,परिणाम,प्रभाव,देश,काल,परिस्थिति,नैतिकता,नियम और आध्यात्म की संकरी गलियों से गुजरता हुआ अपना अर्थ खोजता है।शायद ही कभी वह 'अर्थ' सबको संतुष्ट कर पाया हो।
ईश्वर के अलावा,ब्रह्म
से संयुक्त,मायारहित,निर्विकार,निस्पृह किसी योगी के लिए भी यह कठिन है। पवित्र गीता में भी परमब्रह्म योगेश्वर कृष्ण ने स्वयं को विवादों में 'वाद' कहा है। क्या कोई भी विवाद सर्वज्ञानी,सर्वोच्च सत्य,समस्त जगत के प्राणियों में व्याप्त होकर भी उनसे असंयुक्त रहने वाले परमेश्वर जितना निष्कलंक हो सकता है,अर्थात नहीं।
आशय यह है कि जब तक 'वाद' ही पूर्ण पवित्र न हो, तो आदर्श 'न्याय' की अपेक्षा बेमानी है।

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