#दिल
दहशत का परिवेश मिटा दो
जाति - धर्म का भेद बताए
सुख में दुख की आग लगाए
रोज दिलों में खंजर घोंपे
दुश्मन को सरेराह लिटा दो
दहशत का का परिवेश मिटा दो
सीमाओं के पार खड़ा पर
दिल के भीतर धंसा हुआ है
सपने में भी अपने होकर
न जाने किधर बसा हुआ है
विष का प्याला घोले हर दिन
उसके दिल का द्वेष मिटा दो
दहशत का परिवेश मिटा दो
बे दिल को ऐ दिल, दिल कर दो
मरुस्थल में भी जल जल कर दो
प्रेम बीज का बने अंकुरण
पेड़ों में हरियाली भर दो
करे प्रदूषित जो पर्यावरण को
उसके दुख का केस मिटा दो
दहशत का परिवेश मिटा दो
- शिव सागर शाह "घायल"