सुनना सबकी चाहिए, गुनिए दिल की चाह
मान रहे सबका सदा, निकले अपनी राह
सुन - सुनकर संतन भये, तुलसी, सूर,कबीर
पाप - पुण्य दो छोर हैं, न, मिलें नदी सम तीर
इनकी सुनकर जग हुआ, ज्यों मृत होय सजीव
कुल के कुल सब तर गए, ज्यों पाथर निर्जीव
सुन - सुनकर, सुनकर बने, सुनें सभी की पीर
उपयोगी उनके बनें, प्यासे को ज्यों नीर
सुनकर सबकी वेदना, हरें शरीर की पीर
हंस लगाए ध्यान ज्यों , हरे क्षीर से नीर
#श्रुत