एक नवगीत !मातृदिवस के उपलक्ष्य में
पवन वसंती धीरे आना
माँ सोई, मत उसे जगाना ।
मेहनत के
चौबारों को,लीपा करती थी
माथे की रेखाओं से
ममता झरती थी
सोना जगना उसका कोई
देख न पाया
सूखा दिया हमें, गीले को
खुद अपनाया
मौन हो चुकीं सारी बातें
अब तुम भी कजरी मत गाना ।
रची अल्पना
मेरी, रुचि से रंग सजाये
जाने किस -किस
चौखट जाकर शीश झुकाए
तिल-तिल जोड़ -जोड़कर
दिन को बहुत सजाया
अरमानों की भेज पालकी
चाँद मँगाया
बीत गईं लोरी की रातें
अब तुम भी मत शोर मचाना ।
करती रही
तपस्या,चैन न भाया पलभर
यहीं कहीं मेरे समीप
सोई है छिपकर
सपनों की गलियों में अक्सर
मिल जाती है
कहती नहीं कभी कुछ भी
बस मुस्काती है
तुमको वह कहती थी भाई
आये हो तो मिलकर जाना ।
-कल्पना मनोरमा